
डोगरा वेलफेयर एसोसिएशन, दिल्ली एनसीआर द्वारा राजेंद्र भवन में आयोजित वार्षिक मेल-मिलाप कार्यक्रम में डोगरी–पहाड़ी भाषा और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और एकता का स्वर ज़ोरदार तरीके से गूंजा। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जम्मू-कश्मीर के सदर-ए-रियासत यह चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि डोगरा समाज को कांगड़ा और चंबा जैसे पड़ोसी पहाड़ी-भाषी क्षेत्रों के साथ मिलकर अपनी सांस्कृतिक एकता को मज़बूत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि बहुभाषिक होना समय की ज़रूरत है, लेकिन मातृभाषा की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि नई पीढ़ी को डोगरी बोलने के लिए प्रेरित नहीं किया गया तो यह भाषा आने वाले समय में संकट में पड़ सकती है। डॉ.सिंह ने भाषा संरक्षण में परिवारों, विशेष रूप से माताओं की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए डोगरों से एकजुट, प्रगतिशील और दूरदर्शी बने रहने की अपील की। उन्होंने इस आयोजन के लिए सुदेश डोगरा और समस्त आयोजक टीम को बधाई भी दी।
लोकप्रिय डोगरी-हिमाचली लोकगीत “माये निं मेरिये, जम्मूऐ दी राहे, चंबा कितनी क दूर” में कथित छेड़छाड़ के विरोध में प्रसिद्ध गायक धीरज शर्मा ने गीत को उसके मूल शब्दों में प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति में ज्योति गुप्ता सहित अन्य कलाकारों ने भी भाग लिया। एसोसिएशन ने इस मुद्दे पर जम्मू के प्रमुख साहित्यिक और सांस्कृतिक संगठनों की चुप्पी पर निराशा व्यक्त की, जबकि लोकगीतों की सांस्कृतिक चिंताओं की हिफाजत में आवाज़ उठाने वाले हिमाचली कलाकारों की सराहना की।
वरिष्ठ पत्रकार और भाषा कार्यकर्ता रमन केसर ने कहा कि लोकगीतों के साथ छेड़छाड़ पश्चिमी पहाड़ी और डोगरी को अलग-अलग दिखाने का प्रयास है, जिसका एसोसिएशन रचनात्मक और सशक्त ढंग से विरोध करेगी। इस अवसर पर रोहित महाजन, क्लस्टर हेड, जम्मू एंड कश्मीर बैंक ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने वाले कलाकारों को ट्राफियां भेंट कर के सम्मानित किया।
कार्यक्रम के आयोजन में कैलाशपति शर्मा, सुदेश डोगरा, जगदीश शर्मा , कुलवीर सिंह , कर्नल सुनील शर्मा, नेहा शर्मा, सतपाल शर्मा और बोधराज ठाकुर, राज रैना जी का विशेष योगदान रहा।
डोगरा वेलफेयर एसोसिएशन पिछले चार वर्षों से लोहड़ी के अवसर पर लगातार यह आयोजन कर रही है। एसोसिएशन ने स्वयं को राजनीति से दूर रखा हुआ है और समाजी-सांस्कृतिक कार्यों में लगी हुई है।



