

वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और खाड़ी क्षेत्र में संभावित जमीनी सैन्य कार्रवाई की खबरों ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के महत्वपूर्ण तेल ठिकानों और यूरेनियम भंडार को नियंत्रित करने के लिए ‘ग्राउंड ट्रूप्स’ (जमीनी सेना) भेजने के विकल्पों पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। अमेरिकी अधिकारी विशेष रूप से खार्ग द्वीप पर नियंत्रण पाने पर चर्चा कर रहे हैं, जहाँ से ईरान का 90% कच्चा तेल निर्यात होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस द्वीप को बमबारी से नष्ट करने के बजाय उस पर कब्जा करना बेहतर होगा, ताकि वैश्विक तेल बाजार को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, इसे ‘हाई-रिस्क’ ऑपरेशन माना जा रहा है क्योंकि ईरान के पास वहां मिसाइलों और ड्रोन्स का मजबूत जाल है।
संवर्धित यूरेनियम को जब्त करने की योजना
ट्रंप प्रशासन ईरान के परमाणु कार्यक्रम को जड़ से खत्म करने के लिए उसके यूरेनियम भंडार को जब्त करने हेतु विशेष सैन्य बलों (Special Forces) को तैनात करने पर भी विचार कर रहा है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह मिशन अत्यधिक जटिल और खतरनाक हो सकता है, जिससे सीधे युद्ध छिड़ने का खतरा है। लगभग 2200 मरीन सैनिकों को लेकर हमलावर जहाज यूएसएस त्रिपोली मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरते हुए देखा गया है। अनुमान है कि यह सैन्य समूह अगले 10 से 15 दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य के पास पहुँच जाएगा। यह तैनाती संकेत दे रही है कि अमेरिका केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहना चाहता।
वियतनाम युद्ध की याद और राजनीतिक जोखिम
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या यह एक और ‘वियतनाम युद्ध’ जैसा दलदल साबित हो सकता है, तो उन्होंने बेबाकी से कहा कि वे किसी भी चीज से नहीं डरते। हालांकि, अमेरिका के भीतर इसका भारी विरोध है। सर्वे के अनुसार 74% अमेरिकी मतदाता ईरान में सेना भेजने के खिलाफ हैं। यहाँ तक कि खुद ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के 52% लोग भी इस जमीनी युद्ध के पक्ष में नहीं हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य का पेंच
यह जलमार्ग दुनिया के तेल व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है। ट्रंप का रुख इस पर बदलता रहा है—कभी वे इसकी सुरक्षा का वादा करते हैं, तो कभी कहते हैं कि जो देश इस पर निर्भर हैं, वे खुद इसकी चिंता करें। फिलहाल, अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत अब तक 7800 हमले किए हैं, जिसमें 120 से ज्यादा ईरानी जहाज नष्ट हुए हैं।



