
“धम्मा धम्मा राढ़ेया” की मधुर स्वर-लहरियों से नई दिल्ली के पृथ्वीराज रोड स्थित जम्मू-कश्मीर हाउस का परिसर उस समय गूंज उठा, जब डोगरा वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा विलुप्तप्राय लोकपर्व “रुट्ट राह्ढ़े” के पुनर्जीवन हेतु एक परिचयात्मक एवं प्रदर्शनात्मक कार्यक्रम आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में एसोसिएशन की अध्यक्ष सुदेश डोगरा, जम्मू-कश्मीर हाउस की अधिकारी सविनय कुमारी तथा सत्या देवी, सोनी गुलेरिया पूजा शर्मा, पुष्पा शर्मा और इन्द्रू शर्मा के समूह ने रुट्ट राह्ढ़े से जुड़े पारम्परिक डोगरी गीत प्रस्तुत कर उपस्थित अतिथियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने अपने घरों में तैयार किए गए पारम्परिक व्यंजन—रुट्ट, चिल्ले, बबरू, मदरे तथा घ्यूर—भी अतिथियों को परोसे। इन व्यंजनों की इतनी प्रचुर व्यवस्था थी कि अलग से भोजन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। इस व्यवस्था में वीणा शर्मा तथा पूनम मगोत्रा ने भी महत्वपूर्ण सहयोग दिया।
कार्यक्रम का गीत-संगीत सुप्रसिद्ध गायक धीरज शर्मा के मार्गदर्शन में तैयार किया गया था। पारम्परिक गीतों में समसामयिक संदर्भों के अनुरूप कुछ अतिरिक्त बोल सुदेश डोगरा एवं धीरज शर्मा द्वारा जोड़े गए थे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए जम्मू-कश्मीर के अतिरिक्त रेज़िडेंट कमिश्नर अनिल शर्मा ने डोगरा वेलफेयर एसोसिएशन, दिल्ली-एनसीआर की सराहना करते हुए कहा कि संस्था ने वैज्ञानिक सोच तथा पारम्परिक लोकबुद्धि पर आधारित, विलुप्त होती इस सांस्कृतिक परम्परा से जम्मू-कश्मीर हाउस तथा दिल्ली में रह रहे डोगरा समाज को पुनः परिचित कराने का सराहनीय प्रयास किया है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि भविष्य में भी राज्य की धर्मनिरपेक्ष एवं प्रासंगिक सांस्कृतिक परम्पराओं के संरक्षण के लिए किए जाने वाले ऐसे सभी प्रयासों में जम्मू-कश्मीर हाउस का पूर्ण सहयोग रहेगा।
एसोसिएशन के महासचिव रमन केसर ने रुट्ट राह्ढ़े की परम्परा, उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि तथा वैज्ञानिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए डोगरा संस्कृति से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि वे जम्मू के गांवों में इस परम्परा को पुनर्जीवित करने का अभियान चलाएं तथा डोगरा समुदाय की राष्ट्रीय पहचान को सुदृढ़ बनाने के लिए दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु और चंडीगढ़ जैसे महानगरों में भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस उत्सव का आयोजन करें।
उनके वक्तव्य के दौरान एसोसिएशन की एक टीम—जगदीश शर्मा, सुदेश डोगरा, सतपाल शर्मा, सुरजीत सिंह गुलेरिया, स्वीटी तथा बोधराज सिंह—पूर्व-तैयार राह्ढ़ों को भूमि में स्थापित कर उनके चारों ओर आकर्षक रंगोलियां सजा रहे थे, जिससे उपस्थित लोगों को इस लोकपरम्परा का जीवंत प्रदर्शन देखने का अवसर मिला।
उल्लेखनीय है कि लगभग पूर्णतः लुप्त हो चुकी इस परम्परा को जम्मू के साहित्यकार एवं शिक्षाविद् श्री ध्यान सिंह जी ने 1980-90 के दशक में पुनर्जीवित किया था और पिछले कुछ वर्षों तक इसे चला रहे थे।
दिल्ली की वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. अनिता महाजन ने इस अवसर पर रुट्ट राह्ढ़े के वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अमेरिका में हुए एक हालिया अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि जो लोग अपनी संस्कृति, परम्पराओं, पहनावे और सामाजिक परिवेश से जुड़े रहते हैं, उनमें अवसाद (डिप्रेशन) जैसी मानसिक समस्याओं की संभावना अपेक्षाकृत बहुत कम होती है।
इस आयोजन की व्यवस्थाओं में जम्मू-कश्मीर बैंक का भी उल्लेखनीय सहयोग रहा। बैंक के दिल्ली स्थित क्लस्टर हेड ने भी डोगरा संस्कृति के संरक्षण हेतु संस्था के प्रयासों की सराहना करते हुए कार्यकर्ताओं का उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम में कर्नल सुनील शर्मा, दिल्ली की वरिष्ठ रंगकर्मी एवं नाट्य निर्देशक काजल सूरी, ज्योतिषाचार्य जीतू सिंह, महेश डोगरा तथा कांगड़ा निकेतन से शक्ति शर्मा सहित अनेक प्रतिष्ठित डोगरा व्यक्तित्व उपस्थित रहे।
जारीकर्ता
सुरजीत सिंह गुलेरिया
सचिव
डोगरा वेलफेयर एसोसिएशन




